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स्त्री

Updated: Nov 18, 2023

स्त्री जीवन के कई स्वरूप हैं, जिनके मिलने से ही वह सम्पूर्ण हो सकती है। कोई भी एक हिस्सा छीन लिए जाने से वो अधूरी हो जाती है। नारी जीवन के पहलुओं को संयुक्त किए हुए यह काव्य संकलन है, “स्त्री”।

यह संकलन एक सफर है, स्त्री जीवन के संघर्षों का, हर मुश्किल में उसकी हिम्मत और उम्मीद का, रिश्तों में उसके समर्पण और विश्वास का। दुनियां की नापाक भीड़ में वो खुद को कैसे बचाए और संभाले रखती है, कीचड़ में रह कर भी कमल बने रहने की उसकी कोशिश इन कविताओं में है। इस सफ़र में अनकहे जज्बातों का ज़िक्र है, और सवाल है कि स्त्री को अगर कोई समझ नहीं पाया, तो आखिर क्यूं?

 
स्नेहा बोयापल्ली द्वारा कवर फ़ोटो

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श्रेय

इस संकलन की समीक्षा मधूलिका आचंटा द्वारा की गई है, संपादन एड्लिन डिसूजा द्वारा किया गया है, फोटो स्नेहा बोयपल्ली द्वारा लिया गया है और अभिनय निखिला कोट्नी और रश्मिता रेड्डी द्वारा किया गया है।

 

उत्पाद

यह संकलन पेपरबैक के रूप में उपलब्ध है।


 

कविता I

मरी हुई कविताएँं


लेखक होना आम बात नहीं है, और पता है उससे भी ज्यादा विचित्र क्या है? एक स्त्री जब लेखिका बनती है। समाज उन्हें कभी पूरी तरह अपना नहीं पाता। और इतने दायरे बनाए जाते हैं, कि हद नहीं! ये दायरे उनकी जीवनशैली ही नहीं, उनकी लेखनी पर भी होते हैं। क्या आपको पता है, उन लड़कियों का क्या हुआ जिनकी कविताएँं मार दी गईं?

 
स्नेहा बोयापल्ली द्वारा कवर फ़ोटो

मेरी कलम से क्रांति लिख गई,

जब-जब मुझे समर्पण लिखना था।


मेरा कागज कलम छीना गया,

तो अब मैं मंच पर बोलने लगी हूँं।

मेरे लिखने पे सवाल किए गए,

अब बोलने पे किए जाएंगे।

एक हुक्म हुआ था,

कि, “नहीं लिखना है!”

या वो नहीं लिखना है, जो लिख रही हूँं।

फूल लिखो! त्रिशूल नहीं।

प्यार लिखो! सरकार नहीं।

मौत नहीं! लाश नहीं!

ये नहीं, वो नहीं।

फिर मैंने एक दिन “युद्ध” लिख दिया।

अब वो युद्ध हर रोज़ चलता है,

मेरे अंदर।


“कुंवारी लड़कियों का बगावती होना अशुभ है!”

कहाँं लिखा है?

किसने मेरी हदें तय कर दीं? कब कर दीं?

मेरे भाव और शब्दों को जंजीरों में कैसे बाँंधा जा सकता है? किसने बाँंधा?

कब और क्यूं?


ये दुनिया,

कितनी बेहतरीन कविताओं से वंचित रह गई।

क्यूंकि लेखिकाओं पर,

“अच्छी लड़की” होने का बोझ था।

अच्छी लड़कियाँं कविताएँं नहीं लिखती,

उनकी कविताएँं मर गईं हैं, या मार दी गईं?

कोई नहीं जानता।

या यूँं कहें अच्छी लड़कियां लिखती ही नहीं।

आज्ञाएँं सुनती हैं।

बड़ों की, लोगों की, समाज की।

और सबकी सुनते-सुनते,

अपने आप की सुनना भूल जाती हैं।


मेरी कविताएँ,

उन मरी हुई कविताओं का प्रतिशोध हैं।

 

कविता II

मेरी नीयती


एक स्त्री के जीवन का सबसे खूबसूरत पहलू है उसकी मोहब्बत और उस मोहब्बत का निभाया जाना। पर हर स्त्री ये कहाँं निभा पाई है! कुछ लड़कियों की जिंदगी जद्दोजेहद से कभी खाली नहीं हो पाती है। उनके जीवन की मंजिल ही आम रास्तों से होकर नहीं जाती। उनके रास्ते अलग और अजीब हैं, उन्हीं की तरह।

 
स्नेहा बोयापल्ली द्वारा कवर फ़ोटो

मैंने मोहब्बत नहीं की,

क्यूंकि मुझे क्रांति करनी थी।


उन लड़कियों से बात करनी है,

जो खुद से भी बात नहीं करतीं।


जिन औरतों ने जौहर कर लिया,

उनकी आग से, दिए जलानें हैं।


प्यासे पेड़ों को पानी पिलाते हुए,

मुझे ये कहना है कि, “सब्र करो!”


मुझे उनके साथ दुखी होना है,

जिनके घर-बार बाढ़ में बह गए हैं।


घास काटती औरत को, पानी पिलाना है

दूध पिलाती मां को, निवाले खिलाना है।


मां जलती है, ताकि रोटियां ना जलें

एक दिन वो मटर छीलते हुए, रो देगी!


दोपहर में थकी हुई, मां के माथे पर

मैं नीम के पेड़ की छांव होना चाहती हूँं।


मुझे मां के लिए क्रांति करनी है,

मैं मोहब्बत निभा ही नहीं सकती।

 

कविता III

अटूट


जैसे कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है, वैसे है हमारी परिस्थितियाँं हमें गढ़ती हैं। सबसे कठिन हालात हमारे लिए धूप जैसे होते हैं, जो हमें रोशनी देते हैं। हर बार परिस्थितियाँं आपको हरा नहीं सकतीं, उनसे लड़कर उनके पार जाने का तरीका आपको ढूंढ लेना होगा। क्यूंकि आप हर बार टूट के बिखर नहीं सकते, आपको अटूट बनना होगा।

 
स्नेहा बोयापल्ली द्वारा कवर फ़ोटो

मैं,

पाताल की तलहटी से जन्मी हूँं,

पत्थरों को फाड़ कर, उगी हुई घास हूँं।

अब तुम मुझे नहीं मिटा सकते,

अब बहुत देर हो चुकी है।

बहुत!


अब मेरी जड़ें,

धरती के मध्य आग की तरह धधकती हैं,

एक दिन ये ज्वालामुखी बन के फूटेंगी,

और लावा की तरह,

समस्त धरती पर फैल जायेंगी,

सब कुछ जला देने के लिए,

और फिर उनसे,

मिट्टी का निर्माण होगा।


मैं,

उन फसलों की तरह हूँं,

जो बाढ़ और सूखे दोनों में उग जाते हैं।

तुम पानी दो या धूप,

मेरा खिलना नहीं रोक सकते।

मैं उस अंधेरे से उपजी हुई हूँं,

जहाँं आदमी को ही, आदमी नज़र नहीं आते।

जिसने धूप से जीना सीखा हो,

वो आग से नहीं मरते ।

मेरी हर एक सांस में सूर्य है,

आवाज़? तारों से हैं,

और उम्मीदें? सागर से गहरी हैं।


मैं अपनी आँंखों की मुस्कान से, दुनियां जीत लूंगी।

कैलाश से बहती अलकनंदा को कोई बांध नहीं सकता!


अब तक कैसा है?

  • यह प्यार करती थी

  • यह पसंद है

  • रहने भी दो

  • इस से नफरत की गई

 

कविता IV

मन


स्त्री सुंदर है, पर उससे भी ज्यादा सुंदर है उसका मन। उन्हें हासिल करने की हवस रखने वाली दुनियां ये बात नहीं जानती। अगर स्त्री मन से उनकी नहीं हुई, तो तन से हो ही नहीं सकती। वो भ्रम में हैं जिन्हें लगता है कि बंदिशें लगाने से कोई भी स्त्री उनकी अमानत हो जाती है। जिसका अंतर्मन स्वतंत्र है, वो नारी दुष्प्राप्य है।

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