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स्त्री

Oct 29, 2023
2 min read

Updated: 3 hours ago

I: मरी हुई कविताएँं


मेरी कलम से क्रांति लिख गई,

जब-जब मुझे समर्पण लिखना था।


मेरा कागज कलम छीना गया,

तो अब मैं मंच पर बोलने लगी हूँं।

मेरे लिखने पे सवाल किए गए,

अब बोलने पे किए जाएंगे।

एक कम रोशनी वाली लाइब्रेरी में लकड़ी की पुरानी बुकशेल्फ़, जो पुरानी और लेबल लगी किताबों से भरी है; इनमें से कई किताबें हिंदी/देवनागरी में हैं।
स्नेहा बोयापल्ली द्वारा कवर फ़ोटो

एक हुक्म हुआ था,

कि, “नहीं लिखना है!”

या वो नहीं लिखना है, जो लिख रही हूँं।

फूल लिखो! त्रिशूल नहीं।

प्यार लिखो! सरकार नहीं।

मौत नहीं! लाश नहीं!

ये नहीं, वो नहीं।

फिर मैंने एक दिन “युद्ध” लिख दिया।

अब वो युद्ध हर रोज़ चलता है,

मेरे अंदर।


“कुंवारी लड़कियों का बगावती होना अशुभ है!”

कहाँं लिखा है?

किसने मेरी हदें तय कर दीं? कब कर दीं?

मेरे भाव और शब्दों को जंजीरों में कैसे बाँंधा जा सकता है? किसने बाँंधा?

कब और क्यूं?


ये दुनिया,

कितनी बेहतरीन कविताओं से वंचित रह गई।

क्यूंकि लेखिकाओं पर,

“अच्छी लड़की” होने का बोझ था।

अच्छी लड़कियाँं कविताएँं नहीं लिखती,

उनकी कविताएँं मर गईं हैं, या मार दी गईं?

कोई नहीं जानता।

या यूँं कहें अच्छी लड़कियां लिखती ही नहीं।

आज्ञाएँं सुनती हैं।

बड़ों की, लोगों की, समाज की।

और सबकी सुनते-सुनते,

अपने आप की सुनना भूल जाती हैं।


मेरी कविताएँ,

उन मरी हुई कविताओं का प्रतिशोध हैं।

II: मेरी नीयती


मैंने मोहब्बत नहीं की,

क्यूंकि मुझे क्रांति करनी थी।


उन लड़कियों से बात करनी है,

जो खुद से भी बात नहीं करतीं।


संतरे रंग की साड़ी पहने एक महिला घर के बाहर अपने चेहरे के पास चमकीले गुलाबी फूल और हरी पत्तियां पकड़े हुए है; वह शांत और सोच-विचार करती हुई लग रही है।
स्नेहा बोयापल्ली द्वारा कवर फ़ोटो

जिन औरतों ने जौहर कर लिया,

उनकी आग से, दिए जलानें हैं।


प्यासे पेड़ों को पानी पिलाते हुए,

मुझे ये कहना है कि, “सब्र करो!”


मुझे उनके साथ दुखी होना है,

जिनके घर-बार बाढ़ में बह गए हैं।


घास काटती औरत को, पानी पिलाना है

दूध पिलाती मां को, निवाले खिलाना है।


मां जलती है, ताकि रोटियां ना जलें

एक दिन वो मटर छीलते हुए, रो देगी!


दोपहर में थकी हुई, मां के माथे पर

मैं नीम के पेड़ की छांव होना चाहती हूँं।


मुझे मां के लिए क्रांति करनी है,

मैं मोहब्बत निभा ही नहीं सकती।

III: अटूट


मैं,

पाताल की तलहटी से जन्मी हूँं,

पत्थरों को फाड़ कर, उगी हुई घास हूँं।

अब तुम मुझे नहीं मिटा सकते,

अब बहुत देर हो चुकी है।

बहुत!


लंबी घास के बीच काली मिट्टी से छोटे पीले फूल और हरी पत्तियां निकल रही हैं; एक भावपूर्ण क्लोज़-अप शॉट।
स्नेहा बोयापल्ली द्वारा कवर फ़ोटो

अब मेरी जड़ें,

धरती के मध्य आग की तरह धधकती हैं,

एक दिन ये ज्वालामुखी बन के फूटेंगी,

और लावा की तरह,

समस्त धरती पर फैल जायेंगी,

सब कुछ जला देने के लिए,

और फिर उनसे,

मिट्टी का निर्माण होगा।


मैं,

उन फसलों की तरह हूँं,

जो बाढ़ और सूखे दोनों में उग जाते हैं।

तुम पानी दो या धूप,

मेरा खिलना नहीं रोक सकते।

मैं उस अंधेरे से उपजी हुई हूँं,

जहाँं आदमी को ही, आदमी नज़र नहीं आते।

जिसने धूप से जीना सीखा हो,

वो आग से नहीं मरते ।

मेरी हर एक सांस में सूर्य है,

आवाज़? तारों से हैं,

और उम्मीदें? सागर से गहरी हैं।


मैं अपनी आँंखों की मुस्कान से, दुनियां जीत लूंगी।

कैलाश से बहती अलकनंदा को कोई बांध नहीं सकता!


स्त्री
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श्रेय

इस संकलन की समीक्षा निधि पांडे द्वारा लिखित, मधूलिका आचंटा द्वारा की गई है, संपादन एड्लिन डिसूजा द्वारा किया गया है, फोटो स्नेहा बोयपल्ली द्वारा लिया गया है और अभिनय निखिला कोट्नी और रश्मिता रेड्डी द्वारा किया गया है।


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mridul dubey
mridul dubey
Nov 13, 2023
Silver Patron

When fiction tries to be more fiction.. Anyways these words "are all your's"

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