कर्मपथ
- Writers Pouch

- Feb 25
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Updated: Feb 25
निकला जब-जब मैं कर्मपथ पर
अपनों ने मुझे ललकारा है।
कहते घमंड किस बात की तुम में?
जो तू इतना इठलाता है।

व्यंग देख हृदय खुश मेरा
अभी खुद को और बनाना है।
निकला जब-जब मैं कर्मपथ पर
अपनों ने मुझे ललकारा है।
प्रतिदिन पूछूँ प्रश्न मैं खुद से
अब नया कौन सा बहाना है?
एक क्षणिक प्रयास मात्र से
हटता न कोई अँधियारा है।
है विकल्प अब युद्ध के भाँति
करना या फिर मर जाना है।
निकला जब-जब मैं कर्मपथ पर
अपनों ने मुझे ललकारा है।
श्रेय
यह कविता अभिनव यादव द्वारा लिखी गई है, समीक्षा एड्लिन डिसूजा द्वारा की गई है, संपादन निधि पांडे द्वारा किया गया है, फोटो रोहित हर्षा द्वारा लिया गया है।
राय
उत्कृष्ट
अच्छा
औसत
बुरा



बहुत अच्छा बहुत ही बढ़िया लेखनी! ❤️🧿
Ati uttam lekhni
अति सुन्दर
Uttam lekhni
Adbhut lekhni....