भय की परछाइयाँ
- Writers Pouch

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निशा की नीरावता में जब
पथ शून्य सा हो जाता है,
क्षण-क्षण बीतते समय संग
मन का संशय बढ़ जाता है।
तम के घोर अँधेरों से
उसको तनिक न भय होता,
भय उन दृष्टियों से लगता
जिनमें मानव पशु संजोता।
नयन तो मानव के हैं पर
क्रूर वासना से दहक रहे,
मानो किसी हिंस्र वनचर के
दंत अमा में दमक रहे।

निशा के अंतिम प्रहर से
उसको भय का स्पर्श नहीं,
भय उस क्षण का है जब
घर पहुँचूँ पर हर्ष नहीं।
जब प्रश्नों के तीक्ष्ण बाण
मेरे अस्तित्व को छू जाते,
चिन्ता के आवरण तले
संशय के स्वर गूँज जाते।
लोकमत के चार जनों से
हृदय कभी न काँपता है,
पर अपनों के विश्वास का
टूट जाना संतापता है।
कोसों की दूरी चल लेना
उसके साहस का प्रत्यक्ष है,
पर घर के वे चार कदम
मानो पर्वत के समकक्ष हैं।
बाह्य जगत की न्यायसभा
उसको भयभीत न करती है,
अपनों के मध्य खड़ी हो,
उत्तर देना ही व्यथा बनती है।
वही युवती जो जग से
संघर्षों में विजयी होती,
घर की दहलीज़ पर आकर
क्यों बार-बार पराजित होती!
खुलकर श्वास लेने का
अवसर उसे कहाँ मिलता?
समाज की ऊँची दीवारों में
उसका आकाश है सिमटता।
स्वप्न विशाल पंख प्रबल हैं
उड़ने को आतुर प्राण यहाँ,
पर प्रश्नों के कठोर जाल में
बँध जाता उसका गगन वहाँ।
सत्य यही —
डराती नहीं अमा,
न सूने पथ की कोई कहानी।
भय तो उन अपनों से है,
जो छीन लें उसकी परवाज़ पुरानी।
श्रेय
यह कविता देवांशी शर्मा द्वारा लिखी गई है, समीक्षा संस्कृति शर्मा द्वारा की गई है, संपादन निधि पांडे द्वारा किया गया है, चित्रण एकता पाठक मिश्रा द्वारा लिया गया है।
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