अस्तित्व
Updated: Aug 14
अब जब विश्व युद्ध होगा,
मैं और तुम विपरीत दलों में होंगे।
तुम बंदूक वालों के साथ होगे,
और मैं उन बंदूक की नलियों में फूल डाल दूंगी।
तुम लोगों को गोलियों से घायल कर दोगे,
और मैं पानी लिए हुए भागती दिख जाऊं शायद!

तुम लहू बहाने वालों को, हथियार तेज़ करने के यंत्र दोगे,
और मैं हल्दी के लेप की कटोरी लिए मिलूंगी।
तुम नफ़रत के बीज बोते रहना,
मैं खुरपी लिए रोपाई करती मिलूंगी।
तुम लोगों को तुच्छ, अर्थविहीन समझना
मैं अस्तित्व का बोध कराती रहूंगी।
तुम औरतों से सारे हक छीनोगे तो,
मैं नारी क्रांति की आवाज़ बनूंगी।
और अगर तुमने अंत में मुझे भी मार दिया,
तो मेरी राख से आंधी उठेगी,
और तुम्हारी आंखों में पड़ कर तुम्हें अंधा कर देगी।
मेरी अस्थियों के लिए नदियां नहीं बचेंगी,
और तुम्हारी प्यास के लिए भी।
तुम मुझसे मेरी ज़मीन छीन सकते हो,
तुम मुझसे मेरा अस्तित्व नहीं छीन सकते।
श्रेय
यह कविता निधि पांडे द्वारा लिखी गई है, समीक्षा एड्लिन डिसूजा द्वारा की गई है, संपादन लक्ष्मी चिंतालपति द्वारा किया गया है, फोटो रोहित हर्षा द्वारा लिया गया है।
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Beautifully written with real depth and poignancy, Nidhi 👏